Vice President pays tribute to the bravehearts of Kunja Bahdurpur

The Vice President, Shri M. Venkaiah Naidu today suggested that Union government should encourage states to research upon and compile the history of local heroes of freedom struggle from across the country. He also emphasized on publishing this history in local languages so as to reach the maximum people.

Speaking at an event organised in the remembrance of Shaheed Raja Vijay Singh and his brave men at the village Kunja Bahadur in Haridwar district of Uttarakhand today, Shri Naidu recalled the heroic story of the people of Kunja Bahadur who rose against the British with their king Vijay Singh.

The Britishers had occupied a significant portion of India by the year 1824 when King Vijay Singh declared freedom. He gathered an army of one thousand men from nearby areas such as Garhwal, Kumaon, Bijnor, Saharanpur and Meerut and stopped paying taxes to the British. He eliminated all symbols of British occupation from the area.

The British in turn attacked the fort of Kunja Bahadur. Around 40 Britishers were killed in the fierce battle that ensued and hundreds of Gurjar soldiers were martyred. The British inflicted innumerable atrocities over the people. They hanged hundreds of people from a single tree. The bodies of Raja Vijay Singh and his brave general Kalyan Singh were mutilated and displayed in front of Dehradun prison.

The Vice President said that Raja Vijay Singh and his men made supreme sacrifice for the cause of freedom in 1824, three decades before the first war for independence in 1857, but it is an irony that the stories like Kunja Bahadurpur remain ignored in our history. “Our history is incomplete without the bravery of these heroes ’’, he said.

Mentioning the names of legendary warriors from Uttarakhand such as Ram Pyari Gurjar, Rani Karnawati, Shahmal Singh Tomar and teenage warrior Shivdevi Tomar, Shri Naidu said that our history has been witness to many a struggle wherein people rose against the invaders under the leadership of local heroes to defend their freedom, honour, culture and property.

“But these resistances hardly find any mention in our history”, said Shri Naidu adding that “we need to rectify this mistake”.

He also stressed the need to make such stories mandatory part of our school syllabus so that the new generation can draw inspiration from them.

The Vice President also called for developing a nationalistic approach to our history and research new sources for it. History does not belong to just the rulers, rather it belongs to the people and communities as well, he said emphasizing the need to study local cultural, literary and social history.

Shri Naidu said that heroic stories of local communities are transmitted from generation to generation by oral tradition and form an inseparable part of their being. “Local educational institutions, civil society organizations and media should do serious research on these oral traditions of history telling and to make the whole country aware of them”, he added.

Saying that our history is indebted to the great sacrifices made by our ancestors such as Raja Vijay Singh and his general Shaheed Kalyan Singh, he appealed to the younger generation to respect and follow their ideals.

Talking about the 70th Constitution Day celebrated earlier this week, the Vice President also called for equal respect for Fundamental Duties along with the Fundamental Rights. He reminded the people of fundamental duty ‘to strive towards excellence in all spheres and said that country’s progress depends on each one of us excelling in our respective fields.

He also urged people to spread awareness about fundamental duties in their community, educational institution and professional circles. This will be true tribute to our brave ancestors who sacrificed their everything so that we could breath in a free India, he said.

Putting national integrity above everything else, the Vice President appealed to all citizens to rise above cast, creed, religion and region and to work together for the progress of country. On the occasion, he also appreciated the unity displayed by all communities after the Ayodhya verdict by the Supreme Court of India.

During the occasion, the Vice President was also presented a book detailing the freedom struggle of Kunja Village against.

The Governor of Uttarakhand, Smt. Baby Rani Maurya, Shri Trivendra Singh Rawat, Chief Minister, Uttarkahand, Shri Ramesh Pokhariyal ‘Nishank’, Union HRD Minister, Shri Dhan Singh Rawat, Minister of Education, Govt. of Uttarakhand, Shri Karmveer, President, Shaheed Raja Vijay Singh Smarak & Kanya Shiksha Prasar Samiti, Shri Dharampal Singh, Secretary of the Samiti and peoples representatives from the area were among the dignitaries who graced the occasion.

Following is the full text of Vice President’s speech

“माननीय राज्यपाल, श्रीमती बेबी रानी मौर्य जी

माननीय मुख्यमंत्री, श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री, भारत सरकार डॉ. रमेश पोखरियाल “निशंक” जी

माननीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री, भारत सरकार, श्री प्रहलाद पटेल जी

माननीय कैबिनेट मंत्री, उत्तराखंड सरकार, श्री सतपाल महाराज जी

माननीय कैबिनेट मंत्री, उत्तराखंड सरकार, श्री मदन कौशिक जी

माननीय राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार, श्री धन सिंह रावत जी

लोक सभा, राज्य विधान सभा के माननीय सदस्यगण

सम्मानित आचार्य श्री बाल कृष्ण जी

मीडिया के मित्रों,

सम्मानित अतिथिगण

भाईयों और बहनों,

राजा विजय सिंह स्मारक कन्या प्रसार समिति द्वारा कुंजा बहादुरपुर के नागरिको के शौर्य और वीरता की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में आप सबके बीच उपस्थित होकर स्वयं को धन्य मानता हूँ।

1824 में यह स्थान एक समृद्ध गांव था। यहां के राजा विजय सिंह जी की रियासत सहारनपुर तथा मेरठ तक फैली थी। वीर कल्याण सिंह उनके सेनापति थे।

1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से भी तीन दशक पहले, 1824 तक जब अंग्रेजों ने भारत के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया तब राजा विजय सिंह के नेतृत्व में रियासत वीर के नागरिकों ने विद्रोह कर दिया और आजादी की घोषणा कर दी।

उन्होंने आसपास के क्षेत्रों गढ़वाल, कुमाऊं, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ से 1000 लोगों को संगठित कर सेना तैयार की और माल गुजारी देना बंद कर दिया, ब्रिटिश सत्ता के चिन्हों को मिटा दिया, क्रांतिकारियों को जेल से मुक्त करने के लिए संघर्ष किया, तहसील खजाने पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया।

उन्होंने ब्रिटिश खजाने को लूटा। परिणामस्वरुप अंग्रेजों ने कुंजा बहादुर पुर किले पर आक्रमण कर दिया। भीषण युद्ध में लगभग 40 ब्रिटिश सैनिक मारे गये, सैकड़ों वीर गुर्जर सैनिकों ने बलिदान दिया।

किले पर कब्जा कर, अंग्रेजों ने क्रूर कत्लेआम मचाया, सैकड़ों लोगों को एक ही वृक्ष से लटका कर फांसी दे दी गई। राजा विजय सिंह को और उनके वीर सेनापति कल्याण सिंह के मृत शरीर को देहरादून जेल के सामने प्रदर्शित कर उनके शरीर का अपमान किया गया।

मित्रों,

आज जो हमें मानवाधिकारों का पाठ पढ़ा रहे है, उनका इतिहास क्रूर अत्याचारों से भरा पड़ा है।

मित्रों,

यह विडंबना है कि हमारे इतिहास में कुंजा बहादुर पुर और इस जैसी अनेक शौर्य गाथाओं को भुला दिया गया। इन वीरों के शौर्य के बिना हमारा इतिहास अधूरा है। हमारा इतिहास बोध सीमित है।

देश के इतिहास में ऐसे अनेक संघर्ष हुए, जिनमें स्थानीय जनता ने स्थानीय नायक के नेतृत्व में आततायी आक्रांताओं से अपनी आजादी, अपनी अस्मिता, संस्कृति और संपत्ति को बचाया। दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में ऐसे अनेक विद्रोह हुए जिनमें स्थानीय लोगों ने आक्रांताओं से लोहा लिया।

इसी क्षेत्र की वीरांगना राम पियारी गूजर ने 40000 महिलाओं के साथ 14वीं सदी के आततायी आक्रमणकारी तैमूर लंग को खदेड़ा।

17वीं सदी में गढ़वाल की रानी कर्नावती जिन्होंने मुगल सेना को परास्त किया।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बड़ौत के शाहमल सिंह तोमर, जिन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध आजादी की घोषणा कर दी और वहीं की किशोरी वीरांगना शिवदेवी तोमर जिसने अंग्रेजों को बड़ौत से खदेड़ दिया।

उत्तराखंड का तो इतिहास ही वीरता, आध्यात्म, संस्कृति और शौर्य का पर्याय रहा है। आज भी इस क्षेत्र के युवा देश की सेनाओं में अपने शौर्य का योगदान दे रहे हैं।

इसी प्रकार देश के सभी भागों में स्थानीय स्तर पर आक्रमणकारियों के विरुद्ध विरोध और विद्रोह होते रहे जिनका हमारे ही इतिहास में कोई जिक्र नहीं मिलता।

मित्रों,

यह आवश्यक है कि अपने इतिहास की इस कमी को हम पूरा करें। इतिहास सिर्फ सत्ता का ही नहीं होता, इतिहास स्थानीय समुदायों और समाज का होता है। उनका सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक इतिहास भी उतना ही आवश्यक है। स्थानीय समुदायों की शौर्य गाथाएं उनके संस्कारों का अभिन्न हिस्सा है। किंवदतियों का भाग है जो पीढ़ी दर पीढ़ी प्रचारित होती जाती है।

मैं आग्रह करूंगा कि स्थानीय शिक्षण संस्थाएं, स्वयं सेवी संस्थाएं और मीडिया इन वीरगाथाओं पर और गहन शोध करें। मौखिक परंपराओं और स्रोतों को खोजें। स्थानीय मीडिया इस शौर्य परंपरा से देश को परिचित कराये।

मित्रों,

यह जरूरी है कि स्वाधीनता के लिये इन संघर्षों को देश के इतिहास में समुचित स्थान मिले, वे हमारे पाठ्यक्रम का भाग बनें। तभी हमें अपने इतिहास का एक समग्र राष्ट्रवादी गौरवशाली स्वरूप देखने को मिलेगा।

आवश्यकता है कि हम अपने इतिहास के प्रति राष्ट्रवादी दृष्टि विकसित करें। अपने इतिहास के नये स्रोत खोजें। इतिहास को राष्ट्रवादी संदर्भ में प्रांसगिक बनाये।

मित्रों,

हमारी आजादी इन महान बलिदानों की विरासत है। हम पर उनकी आशाओं, अपेक्षाओं का ऋण है। हम अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित रहें। उन आदर्शों का सम्मान करें, जो राजा विजय सिंह, शहीद कल्याण सिंह जैसे हमारे पूर्वजों ने स्थापित किये। नागरिक के रूप में यही हमारा कर्तव्य है।

मित्रों,

इस सप्ताह के शुरू में देश ने संविधान दिवस के अवसर पर अपने संवैधानिक संकल्पों तथा नागरिक कर्तव्यों को याद किया।

साथियों, इस देश के नागरिक के रूप में आपको संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। साथ ही जिस उद्देश्य, आदर्शों और संकल्प के साथ, “हम भारत के नागरिकों” ने अपने संविधान को स्वीकार किया था, उनको पूरा करने के लिये मौलिक कर्तव्य भी उतने ही आवश्यक हैं-

स्वाधीनता आंदोलन के आदर्शों, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान; देश की एकता, अखंडता और सार्वभौमिकता का संरक्षण; देश की सेवा, सुरक्षा के लिये समर्पण; देश की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता से ऊपर उठ कर सामाजिक सहिष्णुता और सौहार्द बनाना; महिलाओं को सम्मान देना; अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत और संसाधनों का संरक्षण; सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा तथा हिंसा का त्याग; बच्चों और किशोरों को शिक्षित करना; जीवन में वैज्ञानिक, मानवीय दृष्टिकोण रखना तथा हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना-

हर देश अपने नागरिकों से यही अपेक्षा करता है। आपकी उत्कृष्टता में ही देश की उन्नति का मूलमंत्र निहित है।

आज कुंजा बहादुर पुर के वीरों की पुण्य स्मृति में आयोजित इस अवसर पर नागरिक के रूप में अपने मौलिक कर्तव्यों का निर्वाह करने का संकल्प लें तथा इन मौलिक कर्तव्यों के बारें में अपने समुदाय, शिक्षण संस्थाओं, व्यावसायिक संघों में जागृति फैलायें। हमारे वीर पूर्वजों की पुण्य स्मृति में यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आज आपने मुझे इस समारोह में आमंत्रित कर के कुंजा बहादुर पुर के वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का सौभाग्य दिया। स्वयं को धन्य मानते हुए आपका आभार व्यक्त करता हूँ।

जय हिन्द।

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